Sunday, March 1, 2020

स्वाधीन दलाल

स्वाधीन दलाल 

दुख की परवाह नहीं हमको
ना सुख की चाह।
जाह की तो बात ही नहीं जनाब,
फिर क्यों फैलाऊं अफबाह?
जो चाहे सुख
ना भोगना चाहे दुख
वही तो सत्यार्थी, समय का
बनाओ ताजा, फैलाओ सनसनी
ठेकेदार तू किस मजहब का?
स्पष्ट कर दे अपना पक्ष
धोखा ना देना था तेरा लक्ष्य,
परंतु
बन गया स्वाधीन दलाल तू ,
झपटता जहां पैसे की बू।
                     -मोहित कोइराला
            गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय

असम में हिंदी भाषा की स्थिति एवं समस्याएं

        

भारतवर्ष के उत्तर पूर्वी छोर पर प्राकृतिक सौंदर्य के आंचल से ढका प्रदेश 'असम' । यह प्रदेश मुख्यधारा के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में भले ही अपना वर्चस्व नहीं रख पाया हो परंतु इन गतिविधियों से सर्वथा प्रेरित एवं प्रभावित हुआ है। भारतवर्ष की संपर्क भाषा हिंदी के साथ असम का संबंध बहुत पुराना और प्रौढ़ भी है। अगर  सटीक रूप से देखा जाए तो हिंदी भाषा से असम राज्य के लोगों का जुड़ाव भक्तिकाल से लेकर अब तक है। भले ही वह भक्ति काल में वैष्णव धर्म के प्रचार की भाषा 'ब्रज बोली'  के रूप में हो या फिर अखिल भारतीय संपर्क स्थापित करने के लिए 'संपर्क भाषा' के रूप में हो। 

मुख्यत: असम प्रदेश में कुल 14 भाषाएं बोली जाती हैं परंतु यहाँ की मुख्य भाषा असमिया भाषा है। नेपाली, बोडो, बंगाली आदि क्षेत्रीय भाषाएं भी यहाँ प्रमुख है। असम सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इन भाषाओं को शिक्षण हेतु प्रयोग करने के लिए स्वीकृत भी किया गया है।खासकर, असमिया बोडो, नेपाली और बंगाली भाषा में साहित्य चर्चा भी अधिक मात्रा में होती है।इन भाषाओं के अलावा भी असम में कई अन्य जनजातीय भाषाएं बोली जाती हैं जिसमें खामती, देउरी, आहोम, दिमासा, कछारी, मिसिंग आदि भाषाएं हैं। इन सभी प्रमुख भाषाओं के साथ-साथ जनजातीय भाषाओं की प्रयोगशाला के रुप में जानी जाती है यह प्रदेश। यहां की भाषिक भिन्नता भी कहीं न कहीं एक कारण हो सकती है जो इस प्रदेश से हिंदी भाषा के प्रयोजनबोध को अस्वीकार करती दिखाई पड़ती है। 
  
 

असम में हिंदी भाषा के प्रचार की औपचारिक गतिविधियां स्वाधीनता के पूर्व से ही हो चुकी थी। गांधीजी का हिंदी को संपूर्ण भारतवर्ष की संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य के तहत ही असम में भी हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में कार्य किया गया। गांधी जी ने रामराज्य स्थापित करने के लक्ष्य में,  सफलता प्राप्त करने के लिए हिंदी भाषा की भूमिका को अहम मानते थें । सन 1934 के अप्रेल माह में जब गांधी जी 'अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ' की  स्थापना के सिलसिले में गुवाहाटी आए थे तो उसी समय असमिया जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने हिंदी भाषा शिक्षण एवं पठन-पाठन पर जोर देने के लिए प्रेरित किया था। 1934 में ही 'बाबा राघवदास' को उत्तर पूर्वी भारत विशेषतः असम में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए महात्मा गांधी जी ने असम भेजा। ऐसा कतई नहीं कि उस समय असम में हिंदी भाषा प्रेमियों का अभाव था बल्कि अभाव था तो केवल मार्गदर्शन और प्रेरणा स्रोत का। तब असम में भी जातीय भाषा की शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने की लड़ाई जोरों से चल रही थी। इसी समय में 
प्रबल-प्रतापी नेता एवं 'लोकप्रिय' नाम से प्रसिद्ध 'गोपीनाथ बर्दलै' हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए आगे बढ़े और सन 1938 में उन्हीं के अध्यक्षता में हिंदी प्रचार समिति का गठन किया गया। इसी दौरान वर्दलै असम के मुख्यमंत्री बने जिसके कारण हिंदी भाषा के प्रचार का मार्ग अधिक प्रशस्त हुआ। उन्हीं के शासनकाल में ही वित्तीय अनुदान के साथ-साथ राज्य सरकार संचालित विद्यालयों में पांचवी कक्षा तक हिंदी विषय को अनिवार्य किया गया। इसी प्रकार से हिंदी शिक्षण का प्रस्ताव तो रखा गया परंतु समस्या शिक्षक एवं प्रशिक्षकों की नियुक्ति पर आकर अटक जाती है जो समस्या आज भी असम के साथ-साथ अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में विद्यमान है।
असम में हिंदी शिक्षक एवं प्रशिक्षकों की बढ़ती मांग को ध्यान में रखकर 1951 में पहले दूधनै, मीसामारी और दीफु में "हिंदी शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र" स्थापित किए गए। समिति के अथक प्रयासों से और असम सरकार के सहयोग में राज्य सरकार संचालित हाईस्कूलों में आठवीं कक्षा तक हिंदी विषय अनिवार्य किया गया।
प्रारंभिक समय के २० सालों में जिस प्रकार हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में कार्य प्रणाली अपनाई गई उस गति की रफ्तार में पिछले वर्षों की तुलना में धीमेपन आया सा प्रतीत होता है।
देश की राजभाषा व संपर्क भाषा के रूप में संविधान स्वीकृत होने के बावजूद भी असम में हिंदी भाषा की स्थिति आज भी अच्छी नहीं है। इससे जुड़े कई कारणों को यद्दपी सरकारी पक्षों के द्वारा विश्लेषण किया जाता रहा है फिर भी इसमें कोई लक्ष्यणीय सुधार होता दिखाई नहीं देता है। हिंदी भाषा एवं साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते  अपने कर्त्तव्यों को ध्यान में रखते हुए हमने इसके मूलभूत कारणों पर  विचार करने का प्रयास किया है-

वर्तमान असम में हिंदी का अन्य प्रदेशों की तुलना में वर्चस्व कम होने के पीछे कई समस्याएं प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती हैं।
* असम में कक्षा 5 से 8 तक हिंदी भाषा को अनिवार्य किया गया है, ऐसा प्रदेश जहां हिंदी भाषा के पठन-पाठन का परिवेश ना हो और अंतर राज्य संपर्क भाषा के रूप में असमिया भाषा चलती हो ऐसी स्थिति केवल 2 साल में विद्यार्थी को हिंदी की पर्याप्त जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती।
* असमिया भाषा का भले ही उद्भव स्रोत मागधी अपभ्रंश है और दोनों भाषाओं में वर्णगत साम्य है परंतु उच्चारण के स्तर पर भिन्नता भी है । हिंदी में च, छ दो अलग-अलग ध्वनि निकलती हैं परंतु असमिया में च भी स और छ भी स रूप में ही उच्चारित होती है। इसलिए उच्चारण के संदर्भ में यहां बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है। इसलिए प्राथमिक स्तर से ही हिंदी का अध्ययन अध्यापन को अनिवार्य करना होगा, जिससे बच्चों को उच्चारण, काल, लिंग आदि सामान्य व्याकरणिक तत्वों की जानकारी मिल सके।
* मुख्यधारा के हिंदी लेखकों एवं साहित्यकारों द्वारा लिखे गए रचनाओं जैसे कहानी, उपन्यास आदि में उत्तर पूर्वी परिवेश को स्थान ना मिलना भी कहीं ना कहीं वहां के पाठकों की उत्साह में अवरोध उत्पन्न करती हैं।
* सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों एवं आचरण ओं की भिन्नता के कारण प्राय जनजातिय भाषी बच्चे हिंदी भाषा के प्रयोग वैशिष्ट्ए की बारीकियों को समझ नहीं पाते हैं।

किसी भी विषय का उचित ज्ञान एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए शिक्षा व्यवस्था का सटीक होना आवश्यक होता है। परंतु असम में विद्यालय स्तर पर हिंदी शिक्षा पद्धति संतोषजनक नहीं दिखाई देती है। साथ ही महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर भी कोई अधिक बदलाव नहीं देखा जाता है। असम का प्रमुख उच्चशिक्षा संस्थान डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा एवं साहित्य का कोई स्वतंत्र इकाई अभी तक नहीं बनी, और भले ही कहा कि विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा एवं साहित्य की स्वतंत्र इकाई है फिर भी स्नातकोत्तर मैं केवल 50 विद्यार्थी की नामांकन होती है। असम राज्य में स्थित अन्य दो केंद्रीय विश्वविद्यालय क्रमश तेजपुर विश्वविद्यालय और असम विश्वविद्यालय मैं 25 और 46 विद्यार्थियों का ही नामांकन प्रतिवर्ष हो पाता है। देश की संपर्क भाषा की अपने ही भूमि में ऐसी स्थिति संतोषजनक नहीं कहलाती है।

हिंदी भाषा शिक्षण व्यवस्था में सुधार एवं विद्यार्थी को हिंदी भाषा के प्रति आकृष्ट कर , भारतवर्ष में हिंदी की परियोजनबोध को जब तक जागृत नहीं किया जाता, असम में हिंदी भाषा के प्रति जनमानस के रुचि को वृद्धि करने की गति तीव्र होगी कल्पना करना स्वप्न मात्र है।


                                        मोहित कोइराला
                                    हिंदी स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष
                                        हिंदी अध्ययन केंद्र
                              गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर।

संदर्भ ग्रंथ- 
१. हिंदी और पूर्वोत्तर, ISBN-978-87648-50-0  संपादक- कृपाशंकर चौबे, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली।
२. पूर्वोत्तर भारत: भाषा साहित्य और संस्कृति, संपादक- सुनील कुमार एवं आलोक सिंह, ISBN- 978-93-81130-78-6, यश पब्लिकेशन, नई दिल्ली।
३. समन्वय पूर्वोत्तर, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, अंक अक्टूबर-दिसंबर, 2015
४. समन्वय पूर्वोत्तर, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, अंक अक्टूबर- मार्च, 2013-14
५. समन्वय पूर्वोत्तर, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, अंक जुलाई-सितंबर 2010
६. http://www.aus.ac.in/hindi-department/
७. http://www.tezu.ernet.in/dhindi/
८. https://www.gauhati.ac.in/arts/hindi