स्वाधीन दलाल
दुख की परवाह नहीं हमको
ना सुख की चाह।
जाह की तो बात ही नहीं जनाब,
फिर क्यों फैलाऊं अफबाह?
जो चाहे सुख
ना भोगना चाहे दुख
वही तो सत्यार्थी, समय का
बनाओ ताजा, फैलाओ सनसनी
ठेकेदार तू किस मजहब का?
स्पष्ट कर दे अपना पक्ष
धोखा ना देना था तेरा लक्ष्य,
परंतु
बन गया स्वाधीन दलाल तू ,
झपटता जहां पैसे की बू।
-मोहित कोइराला
गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय
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